भ. गी. 6.17
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥
अनुवाद
जो व्यक्ति भोजन एवं मनोरञ्जन में संयमित है, कर्मों के पालन में व्यवस्थित है, और सोने-जागने में भी सन्तुलित है, ऐसे व्यक्ति का योगाभ्यास समस्त दुःखों का नाश कर देता है।
जो व्यक्ति भोजन एवं मनोरञ्जन में संयमित है, कर्मों के पालन में व्यवस्थित है, और सोने-जागने में भी सन्तुलित है, ऐसे व्यक्ति का योगाभ्यास समस्त दुःखों का नाश कर देता है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान में वक्ता बताते हैं कि आध्यात्मिक जीवन 'सदा' (सतत) जीने का मार्ग है, न कि केवल वीकेंड पर करने वाला अभ्यास। 'नियतमानसः' का अर्थ मन को अपने नियंत्रण में ले आना है। इसके फल स्वरूप मिलने वाली 'निर्वाण परम शांति' व 'मत्संस्था' (भगवद्-धाम/स्वरूप) वह स्थिर मानसिक स्थिति है जहाँ व्यक्ति बाहर के वातावरण, शोर या शब्द-बाणों से कभी विचलित नहीं होता।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि 'सदा' का अर्थ केवल ५ मिनट का अभ्यास नहीं है और न ही 'मत्संस्थाम्' का संबंध भौतिक धन-प्रतिष्ठा से है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.१६-१७ में अति भोजन, अति उपवास, अति निद्रा और अति जागरण का निषेध किया गया है। आयुर्वेद के अनुसार पेट का आधा भाग अन्न से, एक चौथाई जल से तथा एक चौथाई वायु के लिए खाली रखना चाहिए। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि 'आहार' का व्यापक अर्थ इंद्रियों के माध्यम से भीतर ग्रहण किया जाने वाला हर विषय है। 'अवबोध' का अर्थ जागते, सोते, खाते और कर्म करते समय पूर्ण जागरूकता (स्वाध्याय व चेतना) बनाए रखना है, जो समस्त दुखों का नाश करती है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि अति भोजन और अति निद्रा योग में बाधक बतलाई गई है, और 'आहार' का अर्थ केवल सप्लीमेंट लेना नहीं है।
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।