भ. गी. 6.27
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥
अनुवाद
जिसका मन शान्त है, जो निष्पाप है, जिसकी रजोगुणात्मक वृत्तियाँ शान्त हो चुकी हैं, और जो ब्रह्म में स्थित है, विशेष रूप से उस योगी को परम आनन्द की प्राप्ति होती है ।
जिसका मन शान्त है, जो निष्पाप है, जिसकी रजोगुणात्मक वृत्तियाँ शान्त हो चुकी हैं, और जो ब्रह्म में स्थित है, विशेष रूप से उस योगी को परम आनन्द की प्राप्ति होती है ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता सांख्य दर्शन के हवाले से बतलाते हैं कि मन यद्यपि सात्विक अहंकार से निर्मित है और सात्विक होने से इसे शांत होना चाहिए, परंतु मन अणु-परिमाण का है। संसार में व्यवहार करने और भिन्न-भिन्न ज्ञानेंद्रियों (देखना, सुनना आदि) से एक साथ ज्ञान प्राप्त करने के लिए मन को तीव्र गति से एक इंद्रिय से दूसरी इंद्रिय की ओर भागना पड़ता है। चूँकि गति व क्रिया रजोगुण का धर्म है, इसलिए संसारी व्यवहार हेतु मन का चंचल होना अनिवार्य हो जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि सात्विक अहंकार तमोगुणयुक्त नहीं होता और मन को अणु-परिमाण (अत्यंत छोटा) बतलाया गया है, न कि विशाल।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): वक्ता इस श्लोक की विलक्षणता बताते हैं कि जहाँ साधारण व्यक्ति सुख के पीछे भागता है, वहाँ इस श्लोक में 'सुखम्' (सुख) कर्ता है जो योगी (कर्म) के पास स्वयं आता है। इसका कारण यह है कि जब योगी का रजोगुण शांत हो जाता है (क्योंकि समस्त पापों का मूल रजस है), मन शांत (प्रशांतमनसम्) और निष्पाप (अकल्मषम्) होकर ब्रह्म-भाव (ब्रह्मभूतम्) में स्थित होता है, तब नित्य गुणातीत उत्तम सुख स्वतः प्रकट होता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि श्लोक में सुख को स्वयं योगी के पास आने वाला बतलाया गया है, और तमोगुण/क्रोध को बढ़ावा देना नहीं बल्कि रजोगुण को शांत कर निष्पाप होना आवश्यक है।
इस श्लोक पर पहला प्रश्न पूछें।