भ. गी. 6.45

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥

अनुवाद

परन्तु जो योगी दृढ़ता से अभ्यास करता है, वह समस्त पापों से शुद्ध होकर अनेक जन्मों* के बाद सिद्धि प्राप्त करता है और तत्पश्चात परम गति को प्राप्त होता है।

टिप्पणियाँ

* यहाँ “अनेक जन्मों” का अर्थ अनिवार्य रूप से असंख्य जन्म नहीं, बल्कि कम-से-कम एक से अधिक जन्म है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.४४ ("पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः...") की व्याख्या के अनुसार, पूर्वजन्म के योग-अभ्यास के संस्कारों के संबंध में 'ह्रियते' (हरी धातु) और 'अवशोऽपि' पदों का क्या अर्थ समझाया गया है, तथा 'जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते' का क्या तात्विक तात्पर्य है?

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