जो योगी [परमात्मा पर ध्यान करता है], वह तपस्वियों से श्रेष्ठ है, [सकाम] कर्म में प्रवृत्त व्यक्तियों से श्रेष्ठ है एवं ब्रह्मज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है। यही मेरा मत है। अतएव हे अर्जुन! तुम योगी बनो।
भगवद्गीता के श्लोक ६.४६ ("तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः...") की व्याख्या के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण योगी को तपस्वियों, ज्ञानियों (शास्त्रज्ञों) और कर्मकांडियों से श्रेष्ठ क्यों बतलाते हैं, तथा इस श्लोक में अर्जुन को 'तस्माद्योगी भवाजुन' (योगी बनो) कहने का क्या विशेष तात्विक अर्थ समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भगवान ने तपस्वियों और केवल शाब्दिक ज्ञानियों से योगी को श्रेष्ठ बतलाया है।
विकल्प ख (सही): श्लोक ६.४६ के अनुसार योगी को तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्मकांडियों से श्रेष्ठ बतलाया गया है। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि बहुधा तपस्वी सिद्धि व ख्याति के लिए शरीर को कष्ट देते हैं,केवल शाब्दिक ज्ञानी आचरण के बिना ज्ञान को भार बना लेते हैं, और सकाम कर्मी अनित्य फल पाते हैं। किंतु योगी (निराशी व निष्काम) अक्षय फल प्राप्त करता है, इसीलिए भगवान कहते हैं कि 'तस्माद्योगी भवाजुन' (तुम योगी बनो)।
भगवद्गीता के छठे अध्याय के अंतिम श्लोक ६.४७ ("योगिनापि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना...") की व्याख्या के अनुसार, 'सर्वश्रेष्ठ योगी' (युक्ततम) किसे बतलाया गया है, तथा श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार 'योगिनाम्' पद में पंचमी विभक्ति की व्याख्या द्वारा भक्त-योगी की क्या विशेष स्थिति सिद्ध की गई है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.४७ में भगवान ध्यानयोग के प्रकरण का उपसंहार करते हुए बतलाते हैं कि अपने अंतरात्मा को भगवान में लगाकर श्रद्धापूर्वक भजन करने वाला भक्त ही 'युक्ततम' (सर्वश्रेष्ठ योगी) है । श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार जैसे श्लोक ६.४६ में पंचमी विभक्ति (तपस्विभ्यः, ज्ञानिभ्यः) से योगी को उनसे अलग व श्रेष्ठ बतलाया गया, वैसे ही 'योगिनाम्' को पंचमी विभक्ति मानकर सिद्ध होता है कि भक्त-योगी सामान्य योगियों से भी विलक्षण व सर्वोच्च वर्ग में स्थित है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भक्ति का संबंध आंतरिक भाव व अंतरात्मा को भगवान में लगाने से है, न कि बाह्य आडंबर से।