भ. गी. 6.47

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥

अनुवाद

समस्त योगियों में भी, वह श्रद्धालु जो अपने मन को पूर्णतः मुझमें एकाग्र करके मेरी उपासना करता है, मैं उसे योगयुक्त व्यक्तियों में सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के श्लोक ६.४६ ("तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः...") की व्याख्या के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण योगी को तपस्वियों, ज्ञानियों (शास्त्रज्ञों) और कर्मकांडियों से श्रेष्ठ क्यों बतलाते हैं, तथा इस श्लोक में अर्जुन को 'तस्माद्योगी भवाजुन' (योगी बनो) कहने का क्या विशेष तात्विक अर्थ समझाया गया है?

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