भ. गी. 6.47
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥
अनुवाद
समस्त योगियों में भी, वह श्रद्धालु जो अपने मन को पूर्णतः मुझमें एकाग्र करके मेरी उपासना करता है, मैं उसे योगयुक्त व्यक्तियों में सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ।
समस्त योगियों में भी, वह श्रद्धालु जो अपने मन को पूर्णतः मुझमें एकाग्र करके मेरी उपासना करता है, मैं उसे योगयुक्त व्यक्तियों में सर्वश्रेष्ठ मानता हूँ।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भगवान ने तपस्वियों और केवल शाब्दिक ज्ञानियों से योगी को श्रेष्ठ बतलाया है।
विकल्प ख (सही): श्लोक ६.४६ के अनुसार योगी को तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्मकांडियों से श्रेष्ठ बतलाया गया है। वक्ता स्पष्ट करते हैं कि बहुधा तपस्वी सिद्धि व ख्याति के लिए शरीर को कष्ट देते हैं,केवल शाब्दिक ज्ञानी आचरण के बिना ज्ञान को भार बना लेते हैं, और सकाम कर्मी अनित्य फल पाते हैं। किंतु योगी (निराशी व निष्काम) अक्षय फल प्राप्त करता है, इसीलिए भगवान कहते हैं कि 'तस्माद्योगी भवाजुन' (तुम योगी बनो)।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक ६.४७ में भगवान ध्यानयोग के प्रकरण का उपसंहार करते हुए बतलाते हैं कि अपने अंतरात्मा को भगवान में लगाकर श्रद्धापूर्वक भजन करने वाला भक्त ही 'युक्ततम' (सर्वश्रेष्ठ योगी) है । श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार जैसे श्लोक ६.४६ में पंचमी विभक्ति (तपस्विभ्यः, ज्ञानिभ्यः) से योगी को उनसे अलग व श्रेष्ठ बतलाया गया, वैसे ही 'योगिनाम्' को पंचमी विभक्ति मानकर सिद्ध होता है कि भक्त-योगी सामान्य योगियों से भी विलक्षण व सर्वोच्च वर्ग में स्थित है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि भक्ति का संबंध आंतरिक भाव व अंतरात्मा को भगवान में लगाने से है, न कि बाह्य आडंबर से।
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