भ. गी. 7.11
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का वह बल हूँ जो काम और राग से रहित है, और मनुष्यों में वह काम हूँ जो शास्त्रविधि के विरुद्ध नहीं है।
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का वह बल हूँ जो काम और राग से रहित है, और मनुष्यों में वह काम हूँ जो शास्त्रविधि के विरुद्ध नहीं है।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार जब दो समानार्थक शब्द एक साथ आते हैं तो उनमें सूक्ष्म भेद होता है। रामानुजाचार्य जी राग को इच्छा और काम को इच्छा की पराकाष्ठा बतलाते हैं। शंकराचार्य जी अप्राप्त की प्राप्ति की इच्छा को काम और प्राप्त में आसक्ति को राग कहते हैं। विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी काम का अर्थ इच्छा तथा राग का अर्थ लाल/क्रोध बतलाते हैं।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि आचार्यों ने काम और राग के अलग-अलग सूक्ष्म अर्थ स्पष्ट किए हैं।
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक में भगवान स्पष्ट करते हैं कि तीनों गुणों के भाव उन्हीं से आते हैं। 'न त्वहं तेषु ते मयि' द्वारा बतलाया गया है कि भगवान प्रकृति के गुणों से परे और स्वतंत्र हैं, जबकि संपूर्ण प्रपंच उनके आश्रित है। इसे बड़े और छोटे वृत्त तथा आकाश और बादल के सुंदर दृष्टांत से समझाया गया है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि सब कुछ भगवान से ही उत्पन्न है और भगवान गुणों के अधीन नहीं बल्कि गुण भगवान के अधीन हैं।
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