ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥
अनुवाद
जो भी मानसिक अवस्थाएँ, चाहे वे प्रकाशमय (सात्त्विक), गतिशील (राजसिक) अथवा जड़तामय (तामसिक) प्रकृति की हों, उन सबको केवल मुझसे ही उत्पन्न जानो। मैं उन गुणों और उनसे उत्पन्न होने वाली मानसिक अवस्थाओं के अधीन नहीं हूँ; बल्कि वे सभी मेरे अधीन हैं।
भगवद्गीता के सातवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक ("बलं बलवतां चाहम्...") की व्याख्या के अनुसार, 'काम' और 'राग' के सूक्ष्म भेद के विषय में विभिन्न महान आचार्यों (टीकाकारों) द्वारा क्या-क्या तात्विक व्याख्याएँ दी गई हैं?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार जब दो समानार्थक शब्द एक साथ आते हैं तो उनमें सूक्ष्म भेद होता है। रामानुजाचार्य जी राग को इच्छा और काम को इच्छा की पराकाष्ठा बतलाते हैं। शंकराचार्य जी अप्राप्त की प्राप्ति की इच्छा को काम और प्राप्त में आसक्ति को राग कहते हैं। विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी काम का अर्थ इच्छा तथा राग का अर्थ लाल/क्रोध बतलाते हैं।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि आचार्यों ने काम और राग के अलग-अलग सूक्ष्म अर्थ स्पष्ट किए हैं।
भगवद्गीता के सातवें अध्याय के बारहवें श्लोक ("ये चैव सात्त्विका भावा...") की व्याख्या के अनुसार, त्रिगुणात्मक भावों (सात्विक, राजसिक, तामसिक) के विषय में भगवान श्रीकृष्ण का क्या सिद्धांत है, तथा 'न त्वहं तेषु ते मयि' का क्या तात्विक रहस्य समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): श्लोक में भगवान स्पष्ट करते हैं कि तीनों गुणों के भाव उन्हीं से आते हैं। 'न त्वहं तेषु ते मयि' द्वारा बतलाया गया है कि भगवान प्रकृति के गुणों से परे और स्वतंत्र हैं, जबकि संपूर्ण प्रपंच उनके आश्रित है। इसे बड़े और छोटे वृत्त तथा आकाश और बादल के सुंदर दृष्टांत से समझाया गया है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि सब कुछ भगवान से ही उत्पन्न है और भगवान गुणों के अधीन नहीं बल्कि गुण भगवान के अधीन हैं।