भ. गी. 7.13

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥

अनुवाद

प्रकृति के तीन गुणों से उत्पन्न इन भावों से मोहित होकर, यह सम्पूर्ण जगत् इनसे परे और अव्यय मुझे नहीं जान पाता है।

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प्रश्न 1, कुल 2

भगवद्गीता के सातवें अध्याय के श्लोक ('त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्...') की व्याख्या के अनुसार, 'जगत' शब्द का क्या वास्तविक अर्थ बतलाया गया है, तथा संसार में जीव के मोह/भ्रम को 'सोपाधिक भ्रम' क्यों कहा गया है?

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