भगवद्गीता के सातवें अध्याय के श्लोक ('त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्...') की व्याख्या के अनुसार, 'जगत' शब्द का क्या वास्तविक अर्थ बतलाया गया है, तथा संसार में जीव के मोह/भ्रम को 'सोपाधिक भ्रम' क्यों कहा गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि निर्जीव वस्तुओं में ज्ञान की पात्रता नहीं होती और संसार का भ्रम सोपाधिक बतलाया गया है, न कि निरुपाधिक।
विकल्प ख (सही): व्याख्यान के अनुसार जड़ जगत में स्वयं जानने की योग्यता नहीं होती, अतः 'जगत' से तात्पर्य संसार के जीवों से है। यह मोह प्रकृति के तीन गुणों के अज्ञान रूपी उपाधि के कारण उत्पन्न 'सोपाधिक भ्रम' है, जो स्फटिक के पास रखी लाल वस्तु की भाँति अज्ञान रूपी उपाधि के हटते ही मिट जाता है।
भगवद्गीता के सातवें अध्याय के श्लोक ('दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया...') की व्याख्या के अनुसार, भगवान की त्रिगुणात्मक माया को केवल अपने बल या इंद्रियों से पार करना क्यों अति-दुष्कर बतलाया गया है, तथा 'मालिक के कुत्ते' और 'सरसों में भूत' के दृष्टांत से इसका क्या समाधान समझाया गया है?
आपका उत्तर सही है।
आपका उत्तर गलत है।
विकल्प क (सही): व्याख्यान के अनुसार मन, बुद्धि और अहंकार में ही माया बैठी हुई है, अतः अपने बल से इसे जीतना वैसा ही है जैसे सरसों में भूत होना। जब साधक भगवान की शरण ग्रहण करता है, तो मायापति का आदेश पाकर माया तुरंत अपना प्रभाव हटा लेती है, ठीक वैसे ही जैसे मालिक के आते ही कुत्ता पूँछ हिलाते हुए नीचे बैठ जाता है।
विकल्प ख (गलत): यह व्याख्या असत्य है क्योंकि माया आंतरिक व त्रिगुणात्मक शक्ति है जिसे केवल भौतिक बल या धन से नहीं जीता जा सकता, बल्कि भगवद्-शरणागति ही इसका एकमात्र उपाय है।